22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया गया. यह 24वां साल है जब इसे मनाया गया, लेकिन अभी भी दुनिया के 50 करोड़ लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.

एक पल को सोचिए कि हमारे लिए साफ पानी पीना, इस्तेमाल करना कितना आसान है. वहीं, दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें यह मौलिक अधिकार नहीं मिल सका है और ऐसे लोगों की आबादी अमेरिका और इंडोनेशिया की कुल आबादी के बराबर है.

और इनमें भारत का हर दसवां व्यक्ति भी शामिल है. वास्तव में पूरी दुनिया की तुलना में हिंदुस्तान में ऐसे लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है जिन्हें स्वच्छ जल मयस्सर नहीं है.

इस बार विडंबना यह है कि विश्व जल दिवस होली से केवल दो दिन पहले ही मनाया गया. जिस दिन हम लाखों लीटर पानी उछालकर बर्बाद कर देते हैं.

आजादी के बाद से हर सरकार ने इस संबंध में कुछ सुधार करने की कोशिश की. अब तक 70 हजार करोड़ रुपये खर्च भी किए जा चुके हैं. लेकिन 2011 में हुए आकलन के मुताबिक सरकार को इसके लिए अभी तीन लाख करोड़ रुपये की जरूरत है.

यद्यपि 7 करोड़ 60 लाख भारतवासी अभी भी स्वच्छ जल से दूर हैं जो चीन की तुलना में 1 करोड़ 20 लाख ज्यादा है. अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त होने वाला करीब 20 फीसदी पेयजल भी सुरक्षित नहीं है.

यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं और यह हमें एक ठोस कारण देते हैं ताकि इस बार की होली हम पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए मनाएं.

7.60 करोड़ 

  • लोगों को भारत में स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है. दुनिया के किसी भी देश के हिसाब से यह संख्या सर्वाधिक है.
  • यह संख्या चीन की तुलना में 1 करोड़ 20 लाख ज्यादा है.
  • वाटरऐड इंडिया एनजीओ के मुताबिक भारत में यह संकट जलापूर्ति कार्यक्रमों में अपर्याप्त मैटेरियल्स और गलत योजना के कारण है.

29 फीसदी 

  • भारतीय घरों में जलापूर्ति के लिए पाइपलाइनें पड़ी हुई हैं.
  • गांवों में केवल 16 फीसदी पाइपलाइनें हैं जबकि शहरों में 54 फीसदी.
  • यह आंकड़े 2012 के नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक हैं.
  • सरकार का लक्ष्य है कि वो 2017 तक 55 फीसदी ग्रामीण घरों में पाइपलाइनों के जरिये जलापूर्ति करे.

20 फीसदी

  • ग्रामीण आबादी जल के खतरनाक स्रोतों से पानी पी रही है. इनमें असुरक्षित कुएं और दूसरे जल स्रोत भी शामिल हैं.
  • विश्व में तीन लाख बच्चों की मौत गंदा पानी पीने की वजह से होती है. इससे ज्यादा बच्चों की मौतें सिर्फ निमोनिया के कारण होती है.
  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की लगभग दस फीसदी आबादी जिस पेयजल का सेवन करती है उसमें किसी ना किसी तरह का रासनयिक प्रदूषण होता है.

 85 फीसदी

  • भारत में उपयोग होने वाला पानी भूमिगत स्त्रोतों से आता है. कुएं और ट्यूबवेल जल के मुख्य स्रोत हैं.
  • गांवों में उपयोग होने वाले पानी का 64 फीसदी हिस्सा परंपरागत कुओं से आता है.
  • लेकिन भूमिगत स्रोतों में पानी का स्तर लगभग आधे से ज्यादा घट चुका है.
  • देश के 40 फीसदी कुओं में पानी का स्तर बेहद कम है. आधिकारिक तौर पर 16 फीसदी कुओं में जलस्तर न्यूनतम स्तर पर है.

59.10 करोड़

  • लोगों को सरकार ने पाइपलाइन के जरिए पानी की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है.
  • पंजाब में 88 फीसदी, पुडुचेरी में 85 फीसदी और अरुणाचल प्रदेश में 82 फीसदी लोगों को पाइपलाइन के जरिए पानी मिल रहा है.
  • झारखंड में केवल 4.3 फीसदी लोगों को पाइपलाइन के जरिए पानी मिलता है जबकि मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा सात फीसदी है.

3.4 लाख करोड़ रुपये

  • ग्रामीण इलाकों के 90 फीसदी घरों में पाइपलाइन के जरिए पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में खर्च होगी.
  • इसका आकलन पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने अपने 2011-2022 एजेंडे में किया है.
  • उत्तर प्रदेश में 68,797 करोड़, बिहार में 40,812 करोड़ और पश्चिम बंगाल में 37,740 करोड़ रुपए खर्च होंगे.
  • करीब 20,456 करोड़ रुपये समुदायों के सहयोग से मिलने की संभावना है.

300 रुपये

  • है स्वच्छ जल ना पाने वाले भारतीयों की औसत दैनिक आय. यह आंकड़ा वाटरएड ने दिया है.
  • ये लोग पानी टैंकर्स से एक रुपये प्रति लीटर पानी खरीदते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक व्यक्ति को प्रतिदिन 150-200 लीटर पानी की जरूरत होती है.
  • इसका मतलब एक व्यक्ति को पानी के लिए अपनी आय का आधे से ज्यादा खर्च करना होगा.

 

लेख स्त्रोत: कैच हिंदी | लेखक: निहार गोखले